॥ मनुष्य जीवन का रहस्य ॥


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं...

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
(गीता १४/३)
मेरी यह आठ तत्वों वाली जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली माता है और मैं ही ब्रह्म रूप में चेतन-रूपी बीज को स्थापित करता हूँ, इस जड़-चेतन के संयोग से ही सभी चर-अचर प्राणीयों का जन्म सम्भव होता है।

संसार यानि प्रकृति आठ जड़ तत्वों (पाँच स्थूल तत्व और तीन दिव्य तत्व) से मिलकर बना है।

स्थूल तत्व = जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश।
दिव्य तत्व = बुद्धि, मन और अहंकार।

हमारे स्वयं के दो रूप होते हैं एक बाहरी दिखावटी रूप जिसे स्थूल शरीर कहते हैं और दूसरा आन्तरिक वास्तविक दिव्य रूप जिसे जीव कहते हैं। बाहरी शरीर रूप स्थूल तत्वों के द्वारा निर्मित होता है और हमारा आन्तरिक जीव रूप दिव्य तत्वों के द्वारा निर्मित होता है।

सबसे पहले हमें बुद्धि तत्व के द्वारा अहंकार तत्व को जानना होता है, (अहंकार = अहं + आकार = स्वयं का रूप) स्वयं के रूप को ही अहंकार कहते हैं। शरीर को अपना वास्तविक रूप समझना मिथ्या अहंकार कहलाता है और जीव रूप को अपना समझना शाश्वत अहंकार कहलाता है।

जब तक मनुष्य बुद्धि के द्वारा अपनी पहिचान स्थूल शरीर रूप में करता रहता है तो वह मिथ्या अहंकार (अवास्तविक स्वरूप) से ग्रसित रहता है तब तक सभी मनुष्य अज्ञान में ही रहते है। इस प्रकार अज्ञान से आवृत होने के कारण तब तक सभी जीव अचेत अवस्था (बेहोशी की हालत) में ही रहते हैं उन्हे मालूम ही नही होता है कि वह क्या कर रहें हैं और उन्हे क्या करना चाहिये।


जब कोई मनुष्य भगवान की कृपा से निरन्तर किसी तत्वदर्शी संत के सम्पर्क में रहता है तो वह मनुष्य सचेत अवस्था (होश की हालत) में आने लगता है, तब वह अपनी पहिचान जीव रूप से करने लगता है तब उसका मिथ्या अहंकार मिटने लगता है और शाश्वत अहंकार (वास्तविक स्वरूप) में परिवर्तित होने लगता है यहीं से उसका अज्ञान दूर होने लगता है।

इसका अर्थ है कि हमारे दोनों स्वरूप ज़ड़ ही हैं, जब पूर्ण चेतन स्वरूप परमात्मा का आंशिक चेतन अंश आत्मा जब जीव से संयुक्त होता है तो दोनों रूपों में चेतनता आ जाती है जिससे ज़ड़ प्रकृति भी चेतन हो जाती है इस प्रकार ज़ड़ और चेतन का संयोग ही सृष्टि कहलाती है।

भगवान की यह दो प्रमुख शक्तियाँ एक ज़ड़ शक्ति जिसमें जीव भी शामिल है "अपरा शक्ति" कहते हैं, दूसरी चेतन शक्ति यानि आत्मा "परा शक्ति" कहते हैं। यही अपरा और परा शक्ति के संयोग से ही सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से चलता रहता है।

श्री कृष्ण ही केवल एक मात्र पूर्ण चेतन स्वरूप भगवान हैं वह साकार रूप मैं पूर्ण पुरुषोत्तम हैं, सभी ज़ड़ और चेतन रूप में दिखाई देने वाली और न दिखाई देने वाली सभी वस्तुयें भगवान श्री कृष्ण का अंश मात्र ही हैं। स्थूल तत्व रूप से साकार रूप में दिखाई देते हैं और दिव्य तत्व रूप से निराकार रूप में कण-कण में व्याप्त हैं।

भगवान तो स्वयं में परिपूर्ण हैं......

पूर्ण मदः, पूर्ण मिदं, पूर्णात, पूर्ण मुदचत्ये।
पूर्णस्य, पूर्ण मादाये, पूर्ण मेवावशिश्यते॥

जो परिपूर्ण परमेश्वर है, वही पूर्ण ईश्वर है, वही पूर्ण जगत है, ईश्वर की पूर्णता से पूर्ण जगत सम्पूर्ण है। ईश्वर की पूर्णता से पूर्ण ही निकलता है और पूर्ण ही शेष बचता है। यही परिपूर्ण परमेश्वर की यह पूर्णता ही पूर्ण विशेषता है।

संसार में कुछ भी नष्ट नहीं होता है, न तो स्थूल तत्व ही नष्ट होते हैं और न ही दिव्य तत्व नष्ट होते हैं, स्थूल तत्वों के मिश्रण से पदार्थ की उत्पत्ति होती है, पदार्थ ही नष्ट होते हुए दिखाई देते हैं, जबकि स्थूल तत्व नष्ट नहीं होते हैं इन तत्वों की पुनरावृत्ति होती है परन्तु जो चेतन तत्व आत्मा है वह हमेशा एक सा ही बना रहता है उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है।

जीव स्वयं में अपूर्ण है जव जीव आत्मा से संयुक्त होता है तब यह जीवात्मा कहलाता है। इससे सिद्ध होता है जीव ज़ड़ ही है और आत्मा जो कि भगवान का अंश कहलाता है अंश कभी भी अपने अंशी से अलग होकर भी कभी अलग नहीं होता है, इसलिये जो आत्मा कहलाता है वह वास्तव में परमात्मा ही है।

*** उदाहरण के लिये ***

जिस प्रकार कोई भी शक्तिशाली मनुष्य अपनी शक्ति के कारण ही शक्तिमान बनता है, शक्ति कभी शक्तिमान से अलग नहीं हो सकती है उसी प्रकार भगवान शक्तिशाली हैं, और "अपरा और परा" भगवान की प्रमुख शक्तियाँ हैं इसलिये जीव भगवान से अलग नहीं है।


इस प्रकार जीव स्वयं भी अपना नहीं है तो स्थूल तत्वों से निर्मित कोई भी वस्तु हमारी कैसे हो सकती है जब इन वस्तुओं को हम अपना समझते हैं तो इसे "मोह" कहते हैं, मिथ्या अहंकार के कारण हम स्वयं की पहिचान स्थूल शरीर के रूप में करने लगते है और मोह के कारण शरीर से सम्बन्धित सभी वस्तुओं को अपना समझने लगते हैं।

तब फिर प्रश्न उठता है कि संसार में अपना क्या है?

जीव का जीवन आत्मा और शरीर इन दो वस्तुओं के संयोग से चलता है, यह दोनों वस्तु जीव को ऋण के रूप में प्राप्त होती है, जीव को भगवान ने बुद्धि और मन दिये हैं। बुद्धि के अन्दर "विवेक" होता है और मन के अन्दर "भाव" की उत्पत्ति होती है। जब बुद्धि के द्वारा जानकर, मन में जो भाव उत्पन्न होता है उसे ही "स्वभाव = स्व+भाव" कहते हैं, यही भाव ही व्यक्ति का अपना होता है। इस स्वभाव के अनुसार ही कर्म होता है।

आत्मा परमात्मा का ऋण है और शरीर प्रकृति का ऋण है, इन दोनों ऋण से मुक्त होना ही मुक्ति कहलाती है, इन ऋण से मुक्त होने की "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार केवल दो विधियाँ हैं।

पहली विधि तो यह है कि बुद्धि-विवेक के द्वारा आत्मा और शरीर अलग-अलग अनुभव करके, जीवन के हर क्षण में "भाव" के द्वारा आत्मा को भगवान को सुपुर्द करना होता है और शरीर को प्रकृति को सुपुर्द करना होता है, इस विधि को "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार "सांख्य-योग" कहा गया है।

दूसरी विधि यह है कि बुद्धि-विवेक के द्वारा अपने कर्तव्य कर्म को "निष्काम भाव" से करते हुए कर्म-फलों को भगवान के सुपुर्द कर दिया जाता है, इस विधि को "श्रीमद भगवत गीता" के अनुसार "निष्काम कर्म-योग" या "भक्ति-योग" कहा गया है और इसी को "समर्पण-योग" भी कहते हैं।

जिस व्यक्ति को "सांख्य-योग" अच्छा लगता है वह पहली विधि को अपनाता है, और जिस व्यक्ति को "भक्ति-योग" अच्छा लगता है वह दूसरी विधि को अपनाता है। जो व्यक्ति इन दोनों विधियों के अतिरिक्त बुद्धि के द्वारा जो भी कुछ करता है, वह व्यक्ति ऋण से मुक्त नहीं हो पाता है, इन ऋण को चुकाने के लिये ही उसे बार-बार जन्म लेना पड़ता है।

इन सभी अवस्था में कर्म तो करना ही पड़ता है और मनुष्य कर्म करने मे सदैव स्वतंत्र होता है, भगवान किसी के भी कर्म में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, क्योंकि किसी के भी कर्म में हस्तक्षेप करने का विधि का विधान नहीं है।

इसलिये मनुष्य को न तो किसी कर्म में हस्तक्षेप करना चाहिये और न ही किसी के हस्तक्षेप करने से विचलित होना चाहिये, इस प्रकार अपनी स्थिति पर दृड़ रहने का अभ्यास करना चाहिये।

जब कोई व्यक्ति अपने आध्यात्मिक उत्थान की इच्छा करता है, तब बुद्धि के द्वारा सत्य को जानकर सत्संग करने लगता है तो उस व्यक्ति का विवेक जाग्रत होता है, तब उसके मन में उस सत्य को ही पाने की लालसा उत्पन्न होती है।

जब यह लालसा अपनी चरम सीमा पर पहुँचती है तब मन में शुद्ध-भाव की उत्पत्ति होती है, तब उस व्यक्ति को सर्वज्ञ सत्य की अनुभूति होती है, यह शुद्ध-भाव मक्खन के समान अति कोमल, अति निर्मल होता है।

बस यही मक्खन परम-सत्य स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को प्रिय है, इस शुद्ध-भाव रूपी मक्खन को चुराने के लिये भगवान स्वयं आते हैं।

यही "कर्म-योग" का सम्पूर्ण सार है। यही मनुष्य जीवन का सार है। यही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। यही मनुष्य जीवन की अन्तिम उपलब्धि है। यही मनुष्य जीवन की परम-सिद्धि है। इसे प्राप्त करके कुछ भी पाना शेष नहीं रहता है। यह उपलब्धि केवल मनुष्य जीवन में ही प्राप्त होती है।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ जीवात्मा बूँद है और परमात्मा सागर है ॥


भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌ ॥ 
(गीता १६/२१)
जीवात्मा का विनाश करने वाले "काम, क्रोध और लोभ" यह तीन प्रकार के द्वार मनुष्य को नरक में ले जाने वाले हैं, इसलिये मनुष्य को इन तीनों से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिये। 

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌ ॥ 
(गीता १६/२२)
जो मनुष्य इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह मनुष्य अपनी आत्मा में स्थित रहकर संसार में कल्याणकारी कर्म का आचरण करता हुआ परमात्मा रूपी परमगति मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। 

"जीवात्मा बूँद है परमात्मा सागर है", बूँद का सागर बनना ही बूँद के जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, बूँद जब-तक स्वयं के अस्तित्व को सागर के अस्तित्व से अलग समझती रहती है तब-तक बूँद के अन्दर सागर से मिलने की कामना उत्पन्न ही नहीं होती है।  

बूँद में इतना सामर्थ्य नहीं है कि वह अपने बल पर सागर से मिल सके, बूँद में जब-तक सागर से मिलने की कामना के अतिरिक्त अन्य कोई कामना शेष नहीं रह जाती है तब-तक बूँद का सागर से मिलन असंभव ही होता है।

जब बूँद में सागर से मिलने की पवित्र कामना उत्पन्न होती है तो एक दिन सागर की एक ऎसी लहर आती है जो बूँद को स्वयं में समाहित कर लेती है तब वही बूँद सागर बन जाती है।

बूँद सागर का अंश है, सागर के गुण ही बूँद में होते हैं, बूँद स्वयं को सागर बनाने का निरन्तर प्रयत्न तो करती है लेकिन अहंकार से ग्रसित होने के कारण बूँद उन गुणों को स्वयं का समझने लगती है, इस कारण बूँद का ज्ञान अहंकार रूपी चादर से ढ़क जाता है। 

इस अहंकार रूपी चादर को हटाने की विधि का पता न होने के कारण ही बूँद सागर नहीं बन पाती है, शास्त्रों के अनुसार बूँद के सागर बनने की प्रक्रिया तीन सीढीयों को क्रमशः एक-एक करके पार करने के बाद ही पूर्ण होती है।   

पहली सीढी
"धर्म":- यानि शास्त्र विधि के अनुसार कर्तव्य पालन करके, क्रोध से मुक्त होना।

दूसरी सीढी
"अर्थ":- यानि कर्तव्य पालन में आवश्यकता के अनुसार धन-संपत्ति का अर्जन करके, धन-संपत्ति के लोभ से मुक्त होना।

तीसरी सीढी
"काम":- यानि कर्तव्य पालन में आवश्यकता के अनुसार अपनी कामनाओं की पूर्ति करके, कामनाओं से मुक्त होना।

तीनों सीढीयों को पार करने के पश्चात ही मंज़िल पर पहुँचकर परमात्मा का दर्शन यानि "मोक्ष" की प्राप्ति होती है, इन्हीं को शास्त्रों ने पुरुषार्थ कहा है।

कर्तव्य पालन की इच्छा में व्यवधान आने से क्रोध उत्पन्न हो जाता है, और कर्तव्य पालन की इच्छा पूर्ण होने से लोभ उत्पन्न हो जाता है, जो मनुष्य दोनों स्थितियों में सम-भाव में रहता हुआ निरन्तर अपने कर्तव्य पालन में लगा रहता है तो वह क्रोध, लोभ और कामना रूपी सीड़ीयों को पार करके शीघ्र ही मंज़िल यानि "मोक्ष" को सहज रूप से प्राप्त हो जाता है।       

जिस प्रकार पहली कक्षा को पास किये बिना कोई भी छात्र दूसरी कक्षा को पास नहीं कर सकता है और दूसरी कक्षा को पास किये बिना तीसरी कक्षा को पास करना असंभव है, उसी प्रकार क्रोध रूपी पहली सीड़ी को पार किये बिना कोई भी मनुष्य लोभ रूपी दूसरी सीड़ी को पार नहीं कर सकता है और लोभ के त्याग के बिना तीसरी सीड़ी यानि कामनाओं से मुक्त होना असंभव है।

इच्छाओं की पूर्ति होने पर ही कामनाओं का अन्त संभव होता है, लेकिन एक इच्छा पूर्ण होने के पश्चात नवीन कामना के उत्पन्न होने के कारण कामनाओं का अंत नहीं हो पाता है। 

इच्छाओं के त्याग करने से कामनाओं का मिटना असंभव है, केवल यही ध्यान रखना होता है कि इच्छा की पूर्ति के समय कहीं कोई नवीन कामना की उत्पत्ति तो नहीं हो रही है। 

कामना पूर्ति के लिये ही मनुष्य को बार-बार शरीर धारण करके इस भवसागर में सुख-दुख रूपी भंवर में फंसकर गोते खाने ही पड़ते हैं, बार-बार शरीर धारण करने की प्रक्रिया से मुक्त होने पर ही मनुष्य जीवन की मंज़िल "मोक्ष" की प्राप्ति होती है। 

"मोक्ष" ही वह लक्ष्य है जिसे प्राप्त करने के पश्चात कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता है, इस लक्ष्य की प्राप्ति मनुष्य शरीर में रहते हुये ही होती है, जिस मनुष्य को शरीर में रहते हुये मोक्ष का अनुभव हो जाता है उसी का मनुष्य जीवन पूर्ण होता है, इस लक्ष्य की प्रप्ति के बिना सभी मनुष्यों का जीवन अपूर्ण ही है।

॥ हरि ॐ तत् सत् ॥ 

॥ भाग्य और पुरुषार्थ के भेद ॥


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं...

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥
(गीता ३/८)
व्यक्ति को अपना नियत कर्तव्य-कर्म ही करना चाहिये क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, कर्म न करने से तो वर्तमान जीवन-यात्रा सफ़ल नही हो सकती है।


प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
(गीता ३/२७)
जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं, अहंकार के प्रभाव से मोह-ग्रस्त होकर अज्ञानी मनुष्य स्वयं को कर्ता समझता है।

हमने संतो के मुख से सुना है और शास्त्रों में पढ़ा भी है कि हमारे पुरूषार्थ से ही हमारा भाग्य बनता है, इस सत्य को सभी जानते हैं। क्या हमने इस सत्य को वास्तविक रूप में समझा भी हैं?

हमारे पूर्व जीवन के कर्म के फलों को "भाग्य" कहते हैं और वर्तमान जीवन में किये गये कर्म को "पु्रूषार्थ" कहते हैं। हम प्रत्येक क्षण भाग्य को भोगते हैं और हम प्रत्येक क्षण पुरूषार्थ भी करते हैं।

हमारे ’शरीर’ के द्वारा जो क्रिया होती है वह हमारे भाग्य के अधीन होती है और हमारे ’मन’ के द्वारा जो क्रिया होती है वह हमारे स्वयं के अधीन पुरूषार्थ के रूप में होती है।

हमारे शरीर की क्रिया प्रकृति के गुणों के द्वारा स्वतः ही होती है, लेकिन मिथ्या अहंकार के कारण हम उसी को हम पुरूषार्थ समझ लेते हैं, जबकि मन की क्रिया स्वभाव के अनुरूप हमारे पुरूषार्थ द्वारा होती है।

हमारे द्वारा पूर्व जीवन में किया गया पुरूषार्थ ही हमारे वर्तमान जीवन में भाग्य के रूप परिवर्तित हुआ हैं और हमारे वर्तमान जीवन में होने वाला पुरूषार्थ हमारे अगले जीवन के भाग्य के रूप में परिवर्तित होगा।

प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्य होती है, जैसी क्रिया होती है वैसी प्रतिक्रिया होती है, क्रिया कर्म स्वरूप ’पुरुषार्थ’ होती है और प्रतिक्रिया फल के रूप में ’भाग्य’ होती है। क्रिया व्यक्ति के अधीन होती है और प्रतिक्रिया प्रकृति के गुणों के अधीन होती है।

जब भाग्य अनुकूल होता हैं तो वर्तमान पुरूषार्थ का फल प्रत्यक्ष दिखलाई देता है, वास्तव में यह वर्तमान पुरुषार्थ का फल नहीं होता है, अहंकार के कारण व्यक्ति इसे वर्तमान पुरुषार्थ का फल समझ लेता है।

वास्तव में सत्य यह है कि वर्तमान पुरूषार्थ से तो व्यक्ति का अगले जीवन का भाग्य निर्माण होता है। जो व्यक्ति भाग्य के भरोसे बैठकर पुरूषार्थ करने बचने का प्रयास करते है उनका अगला जीवन अत्यन्त कष्टप्रद होता है।

शास्त्रों में मनुष्य के लिये पुरूषार्थ के चार चरण बतलायें गये हैं।

१. धर्मः- शास्त्रों में वर्णित प्रत्येक व्यक्ति के अपने "नियत कर्म यानि कर्तव्य-कर्म" देश, समय, स्थान, वर्ण और वर्णाश्रम के अनुसार करना ही "धर्म" कहलाता है, धर्म प्रत्येक व्यक्ति का अलग-अलग और निजी होता है।

२. अर्थः- किसी को भी कष्ट दिये बिना, किसी को धोखा दिये बिना आवश्यकता के अनुसार धन का संग्रह और उपयोग करना "अर्थ" कहलाता है, अर्थ को संग्रह करने का प्रयत्न आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिये, प्रयत्न करके आवश्यकता से अधिक प्राप्त धन से अधर्म ही होता हैं।

३. कामः- शास्त्रों के अनुसार कामनाओं की पूर्ति करने से ही सभी भौतिक कामनायें मिट पाती हैं, कामनाओं की पूर्ति में ही कामनाओं का अन्त छिपा होता है, जब सभी कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो जाते हैं, जब केवल ईश्वर प्राप्ति की कामना ही शेष रहती है, तभी जीव भगवान की कृपा का पात्र बन पाता है।

४. मोक्षः- धर्मानुसार सभी कामनाओं का सहज भाव से अंत हो जाना ही "मोक्ष" कहलाता है, भगवान की कृपा प्राप्त होने पर ही सम्पूर्ण समर्पण के साथ ही सभी सांसारिक कामनाओं का अन्त हो पाता है, तब जीव को भगवान की अनन्य भक्ति प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।

जो व्यक्ति क्रमशः प्रथम तीन पुरूषार्थों का निरन्तर आचरण करता है उसे चोथे पुरूषार्थ की प्राप्ति सहज रूप से प्राप्त हो जाती है।


॥ हरि ॐ तत् सत् ॥

॥ नियम पालन से ही आध्यात्मिक उन्नति संभव ॥


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । 
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌ ॥ 
(गीता १६/२३)

 जो मनुष्य कामनाओं के वश में होकर शास्त्रों की विधियों को त्याग कर अपने ही मन से उत्पन्न की गयीं विधियों से कर्म करता है। वह मनुष्य न तो सिद्धि को प्राप्त कर पाता है, न सुख को प्राप्त कर पाता है और न परम-गति को ही प्राप्त हो पाता है।

जिस प्रकार भौतिक रूप से किये जाने वाले कार्यों के नियम होते हैं, उन नियमों पर चलकर ही भौतिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक रूप से किये जाने वाले कार्यों के नियम होते हैं।

जो व्यक्ति इन नियमों का दृड़ता पूर्वक पालन करता है, उसी व्यक्ति का आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है, और उसी व्यक्ति का मनुष्य जीवन सफल होता है।  

मनुष्य-योनि केवल "आध्यात्मिक उन्नति" के लिये ही प्राप्त होती है, सांसारिक भोंगों के सुख तो देव-योनि से लेकर पशु-योनि तक मनुष्य योनि के मुकाबले बहुत अधिक प्राप्त होते हैं।

"आध्यात्मिक उन्नति" का मार्ग उसी व्यक्ति का प्रशस्त होता है, जो शास्त्रों में बताये गये नियमों का दृड़ता पूर्वक आचरण करता है, उन्हीं नियमों को सार रूप में यहाँ प्रस्तुत किया गया हैं।

"आध्यात्मिक उन्नति" चाहने वाले जिज्ञासु व्यक्तियों के लिये इन नियमों का पालन अत्यन्त आवश्यक है, "भौतिक" उन्नति तो व्यक्ति के प्रारब्ध पर निर्भर करती है।

(१) 
"विश्वास" और "धीरज" नाम के इन दो शब्दों के वास्तविक अर्थ को समझकर इन्हें सदैव याद रखने का प्रयत्न करना चाहिये।

क्योंकि, विश्वास न होने पर अविश्वास स्वतः ही उत्पन्न हो जाता है, जिससे स्वभाव में धीरजता के स्थान पर अधीरता उत्पन्न हो जाती है।

(२) 
जब तक यह विश्वास न हो जाये कि सामने वाला व्यक्ति मुझसे अधिक ज्ञानी है, तब तक उस व्यक्ति से प्रश्न कभी नहीं पूछना चाहिये, हमेशा स्वयं को अज्ञानी, और सामने वाले व्यक्ति को ज्ञानी समझकर ही वार्तालाप करना चाहिये। 

क्योंकि, ऎसा करने से सामने वाले व्यक्ति का ज्ञान और सदगुण हमारे अन्दर स्वतः ही प्रवेश कर जाते हैं।  

(३) 
जब भी किसी व्यक्ति से प्रश्न करें तो कम से कम शब्दों में करने का प्रयत्न करना चाहिये, और प्रश्न करते समय प्रश्न को समझाने का भाव नहीं होना चाहिये, केवल समझने का भाव होना चाहिये। 

क्योंकि, समझाने के भाव से एक प्रश्न करने से अनेक प्रश्न एक साथ स्वतः ही हो जाते हैं, जिससे उत्तर देने वाला जब उन अनेकों प्रश्नों का उत्तर एक-एक करके देने लगता है तो व्यक्ति अपना धीरज खोने लगता है, इस कारण समझना कठिन हो जाता है। 

(४)
जब तक पहले प्रश्न का उत्तर न मिल जाये और संतुष्ट न हो जायें, तब तक दूसरा प्रश्न कभी नहीं करना चाहिये, और जो भी उत्तर मिले, उसे सहज भाव से स्वीकार करने का प्रयत्न करना चाहिये। 

क्योंकि, सहज भाव से उत्तर स्वीकार न करने से व्यक्ति का अविश्वास स्वयं सिद्ध हो जाता है। 

(५)
किसी भी प्रश्न के उत्तर को स्वीकार करते समय केवल यह समझने का भाव होना चाहिये, कि उत्तर देने वाला सही है, हो सकता है कि शब्दों का वास्तविक अर्थ मेरी समझ में नहीं आया है, बाद में एकान्त में विचार करना चाहिये। 

क्योंकि, एकान्त में विचार करने से उन शब्दों के वास्तविक अर्थ स्वतः ही समझ में आ जाते हैं। जब मन उसे स्वीकार करे तभी उस उत्तर को स्वीकार करके उसी अनुसार आचरण करने का प्रयत्न करना चाहिये। 

(६)
जब तक उत्तर देने वाला व्यक्ति, उत्तर देकर शान्त न हो जाये, तब तक बीच में बोलना नहीं चाहिये। बीच में बोलने से नया प्रश्न उत्पन्न हो जाता है। 

क्योंकि, नया प्रश्न उत्पन्न होने से उत्तर देने वाले व्यक्ति का ध्यान भंग हो जाता है, जिससे कुछ भी समझ पाना कठिन हो जाता है, और समय बर्बाद हो जाता है।

(७)
जब तक उत्तर से पूर्ण संतुष्ट न हो जायें, तब तक उसी प्रश्न पर ही दृष्टि रखकर ही प्रश्न करना चाहिये, किसी भी उत्तर पर प्रश्न कभी नहीं करना चाहिये। यदि उत्तर के किसी शब्द का अर्थ समझ में न आये तो निर्मल भाव से प्रश्न अवश्य करना चाहिये। 

क्योंकि, जब शब्द पर प्रश्न किया जाता है तब उत्तर देने वाला समझ जाता है कि प्रश्न करने वाला का ध्यान से सुन रहा है, और जब उत्तर पर प्रश्न किया जाता हैं तो वार्तालाप बहस का रूप धारण कर लेती है, जिससे संतोष के स्थान पर असंतोष उत्पन्न हो जाता है। 

(८)
जब भी किसी भी प्रकार की वार्तालाप बहस में परिवर्तित महसूस हो तो क्षमा माँगकर बात को समाप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।

क्योंकि, क्षमा मांगने से अहंकार मिटता है जिससे मन में संतोष का भाव उत्पन्न हो जाता है।

(९)
जब यदि कोई आपसे प्रश्न करे तो कम से कम शब्दों में उत्तर देने का प्रयत्न करना चाहिये, और केवल अपना ही दृष्टिकोण ही प्रस्तुत करना चाहिये। उस दृष्टिकोण को ही सर्वोच्च समझने का प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिये।

क्योंकि, ऎसा समझने से श्रेष्ठता का दम्भ उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण समझने का भाव समाप्त हो जाता है।  

(१०)
आध्यात्मिक चर्चा को कभी भी सार्वजनिक स्थान पर नहीं करना चाहिये, सार्वजनिक स्थान पर आध्यात्मिक चर्चा, हमेशा बहस का रूप धारण कर लेती है। 

क्योंकि, आध्यात्म सत्य है, सत्य को किसी भौतिक प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है, सत्य को तो विश्वास के साथ केवल धारण करना होता है।

(११)
आध्यात्मिक वार्तालाप करते समय बुद्धि के द्वारा केवल मन को शरणागत भाव में स्थिर रखने का प्रयत्न करना चाहिये। 

क्योंकि, मन सदैव बुद्धि के अधीन होता है, मन के शरणागत भाव में स्थिर होने पर ही सत्य का आचरण होता है।

(१२)
जब भी आध्यात्मिक वार्तालाप करें तो पहले यह निश्चित अवश्य कर लें, कि मैं अपना ज्ञान देना चाहता हूँ, या सामने वाले व्यक्ति से ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ।

क्योंकि, एक समय में केवल एक ही कार्य करना संभव होता है। 

(१३)
जब ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, तो धैर्य के साथ समझने का प्रयास करना चाहिये, जहाँ शरीर हो वहीं पर मन को भी होना चाहिये। अधिकतर व्यक्तियों का शरीर तो वार्तालाप के समय वहाँ होता है, लेकिन मन वहाँ नहीं होता है।

क्योंकि, शरीर की समस्त इन्द्रियों की क्रिया मन के अधीन होती हैं, मन शरीर के साथ न होने पर कुछ भी समझना असंभव होता है।   

(१४)
जब किसी को ज्ञान देना चाहतें हैं, तो केवल अपना भाव ही प्रस्तुत करें, सामने वाले व्यक्ति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा इस बात से मतलब नहीं होना चाहिये। सामने वाले व्यक्ति पर उसकी अवस्था के अनुरूप ही प्रभाव पड़ता है।

क्योंकि, जिस प्रकार भौतिक रूप से दो व्यक्ति एक स्थान पर एक साथ खड़े नहीं हो सकते हैं, उसी प्रकार संसार में सभी व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से अलग-अलग अवस्था में होते हैं। 

(१५)
अपना भाव प्रस्तुत करना हमारा स्वयं का कर्म होता है, और सामने वाले व्यक्ति पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है, यह सामने वाले व्यक्ति का कर्म होता है और हमारे लिये फल होता है। 

क्योंकि, सामने वाले व्यक्ति के कर्म को देखने से फल की आसक्ति उत्पन्न होती है, और फल की आसक्ति के कारण ही सांसारिक कर्म-बन्धन उत्पन्न होता है, सांसारिक कर्म-बंधन ही तो आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा होता है। 

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वार्तालाप करते समय प्रायः ऎसा ही होता है कि वास्तविक रूप से हम सामने वाले व्यक्ति से समझना चाहतें है, लेकिन हम उसी व्यक्ति को समझाने लग जाते हैं, इस बात का एहसास ही नहीं होता है कि हम समझना चाहते हैं, या समझाना चाहते हैं।

इसका मूल कारण है हम सभी मोह रूपी जगत के अंधकार (मोहनिशा) में सोए हुये हैं, इस मोहनिशा से केवल मनुष्य जीवन में ही जागना संभव है।

जब तक हम इन नियमों का दृड़ता पूर्वक पालन नहीं करेंगे तब तक हमारे आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर चलने के सभी प्रयत्न विफल होते रहेंगे, जिससे हमारा मनुष्य जीवन व्यर्थ हो जायेगा।  

मनुष्य जीवन में आध्यात्मिक उन्नति के लिये ही कार्य करना ही एक मात्र उद्देश्य होता है, हमारा मनुष्य जीवन व्यर्थ न हो जाये इसलिये आज से ही हमें इन नियमों के पालन करने का प्रयत्न आरम्भ कर देना चाहिये।

क्योंकि मनुष्य के लिये समय से मूल्यवान अन्य कोई वस्तु नहीं होती है।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ अहंकार परिवर्तन से मुक्ति संभव ॥


भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
(गीता १४/३)
मेरी यह आठ तत्वों वाली जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली माता है और मैं ही ब्रह्म रूप में चेतन-रूपी बीज को स्थापित करता हूँ, इस जड़-चेतन के संयोग से ही सभी चर-अचर प्राणीयों का जन्म सम्भव होता है।

संसार प्रकृति के आठ जड़ तत्वों (पाँच स्थूल तत्व और तीन दिव्य तत्व) से मिलकर बना है।

स्थूल तत्व = जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश।
दिव्य तत्व = बुद्धि, मन और अहंकार।

हमारे स्वयं के दो रूप होते हैं एक बाहरी दिखावटी रूप जिसे स्थूल शरीर कहते हैं और दूसरा आन्तरिक वास्तविक दिव्य रूप जिसे जीव कहते हैं। बाहरी शरीर रूप स्थूल तत्वों के द्वारा निर्मित होता है और हमारा आन्तरिक जीव रूप दिव्य तत्वों के द्वारा निर्मित होता है।

जीव को अपना आध्यात्मिक उत्थान करने के लिये सबसे पहले बुद्धि तत्व के द्वारा अहंकार तत्व को जानना होता है, अहंकार तत्व है जो स्थूल शरीर में रहते हुए कभी समाप्त नहीं हो सकता है।

(अहंकार = अहं + आकार = स्वयं का रूप)

स्वयं के रूप को ही अहंकार कहते हैं, अहंकार दो प्रकार का होता है। शरीर को अपना वास्तविक रूप समझना "मिथ्या अहंकार" कहलाता है और जीव को अपना वास्तविक रूप समझना "शाश्वत अहंकार" कहलाता है।

जब तक मनुष्य बुद्धि के द्वारा अपनी पहिचान स्थूल शरीर रूप से करता है और शरीर को ही कर्ता समझता है तब वह मिथ्या अहंकार से ग्रसित रहता है तब तक सभी मनुष्यों के ज्ञान पर अज्ञान का आवरण चढ़ा रहता है।

अज्ञान से आवृत सभी जीव मोहनिशा (मोह रूपी रात्रि) में अचेत अवस्था (निद्रा अवस्था) में ही रहते हैं उन्हे मालूम ही नही होता है कि वह क्या कर रहें हैं और उन्हे क्या करना चाहिये।

भगवान की दो प्रमुख शक्तियाँ एक ज़ड़ शक्ति जिसमें जीव भी शामिल है "अपरा शक्ति" कहते हैं, दूसरी चेतन शक्ति यानि आत्मा "परा शक्ति" कहते हैं। यही अपरा और परा शक्ति के संयोग से ही सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से चलता रहता है।

जब कोई मनुष्य भगवान की कृपा से श्रद्धा भाव से निरन्तर किसी तत्वदर्शी संत के सम्पर्क में आता है तब वह मनुष्य सचेत अवस्था (जाग्रत अवस्था) में आने लगता है, तब वह अपनी पहिचान जीव रूप से करने लगता है तब उसका मिथ्या अहंकार मिटने लगता है और शाश्वत अहंकार में परिवर्तित होने लगता है यहीं से उसके अज्ञान का आवरण धीरे-धीरे हटने लगता है और ज्ञान प्रकट होने लगता है।

हमारे दोनों स्वरूप ज़ड़ ही हैं, जब पूर्ण चेतन स्वरूप "परमात्मा" का आंशिक चेतन अंश "आत्मा" जब जीव स्वरूप से संयुक्त होता है तब हमारे आन्तरिक स्वरूप जीव में चेतनता आ जाती है जिससे हमारा बाहरी स्वरूप स्थूल शरीर में भी चेतन शक्ति का संचार हो जाता है, इस प्रकार ज़ड़ और चेतन का संयोग से सृष्टि का संचालन निरन्तर होता रहता है।

जीव मिथ्या अहंकार के कारण ही स्थूल शरीर धारण करके बार-बार जन्म और मृत्यु को प्राप्त होता रहता है, जब जीव का मिथ्या अंहकार मिटकर शाश्वत अहंकार में परिवर्तित हो जाता है तभी जीव मोक्ष के मार्ग पर चलने लगता है।

मिथ्या अहंकार के मिट जाने पर ही जीव की मुक्ति संभव होती है।


॥ हरि ॐ तत सत ॥ 

॥ संसार एक कारागार है ॥


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌ ॥ 
(गीता ४/१५)
हे अर्जुन! पूर्व समय में बन्धन से मुक्त होने की इच्छा वाले मनुष्यों ने मेरे दिव्य-ज्ञान को समझकर कर्तव्य-कर्म के द्वारा ही मोक्ष की प्राप्ति की है, इसलिए तू भी उन्ही का अनुसरण करके अपने कर्तव्य का पालन कर।

हम सभी भगवान के अपराधी हैं हम सभी सजा भोगने के लिये संसार में आये हैं, सजा से मुक्त होना ही हमारे जीवन का एक मात्र उद्देश्य है।

जिस प्रकार कोई व्यक्ति राष्ट्र के नियमों का उलंघन करके अपराध करता है तो उसे सजा भोगने के लिये कारागार में डाल दिया जाता है, कारागार में व्यक्ति को अपराध के अनुसार निम्न प्रकार से उच्च प्रकार की कोठरी रहने को दी जाती है।

यदि कोई व्यक्ति कारागार में ही जन्म लेता है और कारागार में ही अपना जीवन व्यतीत करता है, जिसने कारागार से बाहर का जीवन कभी देखा ही नहीं है तो वह व्यक्ति कारागार के जीवन को ही अपना वास्तविक जीवन समझता रहता है।

जब तक व्यक्ति को कारागार का जीवन ही अच्छा लगता है तब तक व्यक्ति कारागार से छूटने का प्रयत्न कभी नहीं करता है, और जब कभी किसी अधिकारी की कृपा से उस व्यक्ति को कारागार से बाहर के जीवन दिखलाया जाता है तभी वह व्यक्ति कारागार से छूटने पर विचार करता है। 

तब वह व्यक्ति कारागार के नियमों को जानकर उन नियमों का पालन करने लगता है तो उस व्यक्ति को निम्न कोठरी से उच्च कोठरी दे दी जाती है, इस प्रकार क्रमशः कारागार के नियमों का पालन करते हुए एक दिन उस व्यक्ति को उच्च कोठरी से सर्वोच्च कोठरी प्राप्त हो जाती है। 

जब व्यक्ति उस सर्वोच्च कोठरी में रहकर सभी कैदियों के साथ प्रेम पूर्वक आचरण करता हुआ कारागार के नियमों का पालन ईमानदारी से करने लगता है तो वह व्यक्ति एक दिन कारागार से शीघ्र मुक्त हो जाता है।

उसी प्रकार हम सभी भगवान के परम-धाम (राष्ट्र) के निवासी हैं, यह संसार भगवान के परम-धाम का एक कारागार है, और इस कारागार में चौरासी लाख प्रकार की योनि (शरीर रूपी कोठरी) है, इन सभी योनियों में मनुष्य रूपी सर्वोच्च शरीर (कोठरी) है।

जब हम सभी ने भगवान के परम-धाम के नियमों का उलंघन करके अपराध किया था तो हमें सजा भोगने के लिये हमारी स्मृति को छीनकर संसार रूपी कारागार में डाल दिया गया था। 

अब हम सभी निम्न प्रकार के विभिन्न शरीरों में सजा भोग कर मनुष्य रूपी सर्वोच्च शरीर को प्राप्त कर चुकें हैं, यदि अब हम संसार रूपी प्रकृति के नियमों का पालन ईमानदारी से करेंगे तो हम सजा से शीघ्र मुक्त हो सकते हैं।  

प्रकृति के नियम वेद-शास्त्रों में विस्तृत रूप से और "श्रीमद भगवद गीता" में सार रूप से प्रस्तुत हैं, जिसे पढ़कर या अधिकारिक गुरु के द्वारा भी जाना जा सकता है, प्रकृति के नियम प्रत्येक व्यक्ति के लिये अपनी अवस्था के अनुसार भिन्न-भिन्न होते है।

जो व्यक्ति अपनी अवस्था के अनुसार नियमों को जानकर सभी प्राणीयों के साथ प्रेम पूर्वक आचरण करता हुआ इन नियमों का पालन ईमानदारी से निरन्तर करता है तो वह व्यक्ति इस संसार रूपी कारागार से शीघ्र मुक्त हो जाता है।

हम सभी ने संसारिक जीवन को ही अपना वास्तविक जीवन समझ रखा है, प्रभु कृपा से किसी व्यक्ति को गुरु के माध्यम से जब सांसारिक जीवन से बाहर के जीवन का अनुभव हो जाता है तभी वह व्यक्ति इस संसार से छूटने का प्रयत्न करने लगता हैं।

इसलिये हम सभी को अपनी अवस्था के अनुसार प्रकृति के नियमों का पालन ईमानदारी से करने का प्रयत्न करना चाहिये, जिससे हम सभी से अब ऎसे अपराध न हो जाये कि हमें फिर से निम्न शरीर (कोठरी) में डाल दिया जाये।

॥ हरि ॐ तत सत ॥  

॥ विचार परिवर्तन से ही परमगति संभव ॥

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥
(गीता ८/१४)
हे पृथापुत्र अर्जुन! जो मनुष्य मेरे अतिरिक्त अन्य किसी का मन से चिन्तन नहीं करता है और सदैव नियमित रूप से मेरा ही स्मरण करता है, उस नियमित रूप से मेरी भक्ति में स्थित भक्त के लिए मैं सरलता से प्राप्त हो जाता हूँ।

विचारों के परिवर्तन से स्वभाव में परिवर्तन होता है, स्वभाव परिवर्तन क्रमशः एक-एक सीढ़ी चढ़कर ही हो सकता है, संसार में मंज़िल पर पहुँचने के लिये क्रमशः ही चलने का विधान होता है, जो लोग छलांग मारने का प्रयत्न करते हैं, वह कभी मंज़िल पर नहीं पहुँच पाते हैं।

विचार चार प्रकार के होते हैं, यही ईश्वर प्राप्ति की चार सीढ़ीयाँ हैं, विचारों के अनुरूप हर व्यक्ति का स्वभाव होता है, स्वभाव के अनुरूप कर्म होते हैं, कर्म ही बन्धन का कारण होते हैं और कर्म ही मुक्ति का कारण होते हैं।

१. दुर्विचार या बुरे विचारः- स्वयं के हित के चिंतन करने से दुर्विचारों की उत्पत्ति होती है, इन विचारों से पाप-कर्म होते हैं, पाप-कर्म का फल दुखः की प्राप्ति होता है।

२. सुविचार या अच्छे विचारः- दूसरों के हित के चिंतन करने से सुविचारों की उत्पत्ति होती है, इन विचारों से पुण्य-कर्म होते है, पुण्य-कर्म का फल सुख की प्राप्ति होता है।

३. निर्विचार या विचार शून्यताः- इस अवस्था में होने वाले कर्मों से बन्धन उत्पन नहीं होता है, लेकिन परमगति भी नहीं मिलती है। (यह केवल सांख्य-योगीयों के लिये है, कर्म-योगीयों के लिये नहीं है)

४. भगवदीय विचारः- भगवान के चिंतन से भक्ति-कर्म होते हैं, भक्ति-कर्म का फल मुक्ति या ईश्वर की प्राप्ति होता है।

पहले और दूसरे प्रकार के विचारों से संस्कारों की उत्पत्ति होती है, अधिकांश मनुष्य इन्ही दोनों विचारों के बीच में ही चिंतन करते हैं। जो जीवात्मा को संसार में जन्म-मृत्यु का कारण बनकर जीव को सुख और दुख भोगने पर विवश करते हैं।

तीसरे और चोथे प्रकार के विचारों से संस्कारों की उत्पत्ति नहीं होती है, जो जीवात्मा को संसार से मुक्ति का कारण बनकर परमगति प्रदान करते हैं, जिसे प्राप्त करके जीवात्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाता है।

"सांख्य-योगी" यानि सन्यासी को चार सीढ़ीयाँ चढ़नी होती है, जबकि "कर्म-योगी" को केवल तीन सीढ़ीयाँ ही चढ़नी होती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....

संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥
(गीता ५/२)
सन्यास माध्यम से किया जाने वाला कर्म (सांख्य-योग) और निष्काम माध्यम से किया जाने वाला कर्म (कर्म-योग), ये दोनों ही परमश्रेय को दिलाने वाला है परन्तु सांख्य-योग की अपेक्षा निष्काम कर्म-योग श्रेष्ठ है।

प्रकृति का नियम हैं अगली सीढ़ी पर चढ़ने के लिये पिछली सीढ़ी को छोड़ना होता हैं, जबकि अधिकांश मनुष्य अगली सीढ़ी पर चढ़ना तो चाहते हैं लेकिन पिछली सीढ़ी को छोड़ना ही नही चाहते हैं। यही कारण है कि वह आगे नहीं बढ़ पाते हैं।

जो व्यक्ति पिछली सीढ़ी को नहीं छोड़ते हैं वह कभी आगे नहीं बढ पाते हैं, जो व्यक्ति पिछली सीढ़ीयों को छोड़ते जाते हैं वह मंज़िल पर पहुँच पाते है।

इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचारों का अध्यन करने का अभ्यास करना चाहिये कि मेरे मन में कौन सा चिंतन चल रहा है, यह तभी संभव है जब व्यक्ति दूसरों के विचारों को जानने का प्रयत्न बन्द करेगा।

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

॥ ज्ञान और अहंकार ॥

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः॥
(गीता ४/१९)
जिस मनुष्य के निश्वय किये हुए सभी कार्य बिना फ़ल की इच्छा के पूरी लगन से सम्पन्न होते हैं तथा जिसके सभी कर्म ज्ञान-रूपी अग्नि में भस्म हो गए हैं, बुद्धिमान लोग उस महापुरुष को पूर्ण-ज्ञानी कहते हैं।

एक नव युवा साधक एक ब्रह्मनिष्ठ संत जी के सत्संग के लिए पहुँचे, वह बातचीत के दौरान बार-बार कहते थे, मैं बहुत धनी परिवार से हूँ, मैंने संस्कृत में उच्च शिक्षा प्राप्त की है और वेद, गीता, महाभारत, पुराणों आदि का गहन अध्ययन किया है।

संत जी ने कहा, यदि वास्तव में जिज्ञासा लेकर आए हो और धर्म-अध्यात्म का मर्म समझने की तृष्णा है, तो सबसे पहले इस अहंकार का त्याग करो कि तुम बहुत बड़े विद्वान हो।

अहंकार के रहते तुम किसी से भी कुछ नहीं सिख सकते हो, उन्होंने कुछ क्षण रुककर कहा, उपनिषदों में व्यास देव जी घोषित करते हैं जो यह कहता है कि मुझे ज्ञान है और बहुत कुछ जानता हूँ।

उसे यह समझ लेना चाहिए कि वह घोर अज्ञान के अंधकार में भटक रहा है, न जानने का बोध ज्ञान की गुरुता का सर्वोपरि सम्मान है, वही परमात्मा के प्रति समर्पण भी है।

उन्होंने आगे कहा, ज्ञान का अहंकार किसी से कुछ सीखने ही नहीं देता है, जो मानव विनम्रता पूर्वक खुद को अज्ञानी मानकर तत्वदर्शी की शरण लेता है, वही आत्मा-परमात्मा व ज्ञान-अज्ञान के भेद को जान सकता है।

जिनकी बुद्धि स्थित है और जिसका मन कहीं अटका नहीं है, ऐसा विनयी जिज्ञासु ही ज्ञान के सागर में गोते लगाकर मोती ढूंढ सकता है, सबसे पहले किसी भी प्रकार के अहंकार से शून्य हो जाना जरूरी है।

अज्ञानता में तुलसीदास जी को अपनी स्त्री में ही सुख व प्रेम दिखाई देता था, पर जब ज्ञान चक्षु खुल गए, तो उनके मुख से निकला,

सियाराम मय सब जग जानी।
करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी॥


इस दृष्टान्त के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं ही पहचानना है, कहीं वह नया साधक "मैं" तो नहीं हैं?  

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ सम्पूर्ण गीता का सार ॥


भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं...

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
(गीता २/४७)
हे अर्जुन! तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में अधिकार नहीं है, इसलिए तू न तो अपने-आप को कर्मों के फलों का कारण समझ और न ही कर्म करने में तू आसक्त हो।

कर्म करना और फल की इच्छा न करना ही "निष्काम कर्म-योग यानि भक्ति-योग" है, बिना भक्ति-योग के भगवान की प्राप्ति असंभव है।

कर्म का बीज बो देने पर फल का उत्पन्न होना निश्चित ही होता है, फल जायेगा कहाँ? फल तो बीज बोने वाले को ही मिलेगा, कोई दूसरा तो उस फल को खा ही नहीं सकता है तो हमें चिन्ता करने की क्या आवश्यकता है।

जब हम अपने कर्म एवं दूसरों के हितों को देखते हैं तब हमसे पुण्य-कर्म हो रहा होता है, और जब हम दूसरों का कर्म एवं अपना हित देखते हैं तब हमसे पाप-कर्म ही हो रहा होता है। इसलिये हमें केवल स्वयं के कर्म को ही देखना चाहिये कि हमसे कौन सा कर्म हो रहा है।

बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होय।

जैसा कर्म रूपी बीज हम बोते हैं वैसा ही फल प्राप्त होता है, जब हम बबूल (पाप-कर्म) का बीज बोते हैं तो हमें काँटे (दुख) ही मिलते हैं, और जब हम आम (पुण्य-कर्म) का बीज बोते हैं तो हमें आम (सुख) मिलता है।

जो बीज बोता है फल भी केवल वही खाता है, यही आध्यात्म (सत्य) है, लेकिन भौतिक संसार में यह उल्टा दिखलाई देता है, बीज कोई बोता हुआ दिखाई देता है और फल कोई और खाता दिखाई देता है।

इसी स्थिति पर गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को उल्टे वृक्ष की उपमा दी है।

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥
(गीता १५/१)
हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है।

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
(गीता १५/२)
इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फ़ैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बन्धन उत्पन्न करती हैं।

जब हम फल की इच्छा से कर्म करते हैं तब सकाम-फल यानि दुख-सुख रूपी विष के समान विषय-भोगों की प्राप्ति होती है, इस फल को भोगने के लिये हमें बार-बार जन्म लेना पड़ता है।

जब हम बिना फल की इच्छा से कर्म करते हैं तब निष्काम-फल यानि अमृत-फल की उत्पत्ति होती है जिसे प्राप्त कर हम परम-आनन्द अवस्था में स्थित होकर जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्त हो परमगति को प्राप्त हो सकते हैं।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ ज्ञानी और अज्ञानी के भेद ॥


कार्य हमेशा तीन प्रकार से मन, वाणी और शरीर के द्वारा ही किये जाते है, किसी भी कार्य को करते समय "कब हम अज्ञानी होते हैं और कब ज्ञानी होते हैं।"

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥
(गीता ४/२०)
जो मनुष्य अपने सभी कर्म-फलों की आसक्ति का त्याग करके सदैव सन्तुष्ट तथा स्वतन्त्र रहकर सभी कार्यों में पूर्ण व्यस्त होते हुए भी वह मनुष्य निश्चित रूप से कुछ भी नहीं करता है।

१. जब हम स्वयं के सुख की कामना करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम दूसरों के सुख की कामना करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।

२. जब हम दूसरों को जानने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं को जानने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।

३. जब हम स्वयं को कर्ता मानकर कार्य करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम भगवान को कर्ता मानकर कार्य करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।

४. जब हम दूसरो को समझाने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं को समझाने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।

५. जब हम दूसरों के कार्यों को देखने का प्रयत्न करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं के कार्यों को देखने का प्रयत्न करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।

६. जब हम दूसरों को समझाने के भाव से कुछ भी कहते या लिखते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम स्वयं के समझने के भाव से कहते या लिखते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।

७. जब हम संसार की सभी वस्तुओं को अपनी समझकर स्वयं के लिये उपभोग करते हैं तब हम अज्ञानी होते हैं, और जब हम संसार की सभी वस्तुओं को भगवान की समझकर भगवान के लिये उपयोग करते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं।

ज्ञानी अवस्था में किये गये सभी कार्य भगवान की भक्ति कार्य ही होते हैं।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ ईश्वर प्राप्ति के १२ क़दम ॥


यह उन व्यक्तियों के लिये है जिनके सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥
(गीता १२/८)
भावार्थ : हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगा, इस प्रकार तू निश्चित रूप से मुझमें ही सदैव निवास करेगा, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है।

तुलसी दास जी कहते हैं....

बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

१. जब व्यक्ति सच्चे मन से सत्संग की इच्छा करता है, तब कृष्ण कृपा से उस व्यक्ति को सत्संग प्राप्त होता है।

२. सत्संग से व्यक्ति का अज्ञान दूर होता है।

३. अज्ञान दूर होने पर ही कृष्णा से राग उत्पन्न होने लगता है।

४. जैसे-जैसे कृष्णा से राग होता है, वैसे-वैसे ही संसार से बैराग होने लगता है।

५. जैसे-जैसे संसार से बैराग होता है, वैसे-वैसे विवेक जागृत होने लगता है।

६. जैसे-जैसे विवेक जागृत होता है वैसे-वैसे व्यक्ति कृष्णा के प्रति समर्पण होने लगता है।

७. जैसे-जैसे कृष्णा के प्रति समर्पण होता है वैसे-वैसे ज्ञान प्रकट होने लगता है।

८. जैसे-जैसे ज्ञान प्रकट होता है, वैसे-वैसे व्यक्ति सभी नये कर्म बन्धन से मुक्त होने लगता है।

९. जैसे-जैसे कर्म-बन्धन से मुक्त होता है, वैसे-वैसे कृष्णा की भक्ति प्राप्त होने लगती है।

१०. जैसे-जैसे भक्ति प्राप्त होती है, वैसे-वैसे व्यक्ति स्थूल-देह स्वरूप को भूलने लगता है।

११. जैसे-जैसे ही व्यक्ति स्थूल-देह स्वरूप को भूलता है, वैसे-वैसे आत्म-स्वरूप में स्थिर होने लगता है।

१२. जब व्यक्ति आत्म-स्वरूप में स्थिर हो जाता है तब कृष्णा आनन्द स्वरूप में प्रकट हो जाता है।

इसी अवस्था पर संत कबीर दास जी कहते हैं.....


प्रेम गली अति सांकरी, उस में दो न समाहिं।
जब मैं था तब हरि नहिं, अब हरि है मैं नाहिं॥

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ ईश्वर की आराधना कब और कैसे? ॥


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं......

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥
(गीता ३/१९)
भावार्थ : "कर्म-फ़ल में आसक्त हुए बिना मनुष्य को अपना कर्तव्य समझ कर कर्म करते रहना चाहिये, क्योंकि अनासक्त भाव से निरन्तर कर्तव्य-कर्म करने से मनुष्य को एक दिन परमात्मा की प्रप्ति हो जाती है।"

"कर्मयोगी" व्यक्ति को सबसे पहले कर्तव्य-कर्म को करना चाहिये, कर्तव्य-कर्म से मुक्त होकर ही किसी भी प्रकार से भगवान की आराधना करनी चाहिये, जो व्यक्ति कर्तव्य कर्म को छोड़कर भगवान की आराधना करते हैं उस व्यक्ति से भगवान कभी प्रसन्न नहीं होते हैं।

"पुराणों के अनुसार जिस-जिस ने भी भगवान को प्राप्त किया केवल अपने कर्तव्य कर्म पर दृड़ रहकर ही प्राप्त किया", कर्तव्य-कर्म को जब अनासक्त भाव से किया जाता है तब कर्तव्य-कर्म ही भगवान की आराधना बन जाता है।

कर्तव्य-कर्म के अतिरिक्त भगवान से जुड़कर जो कुछ भी किया जाता है वह सब भावात्मक रूप से होता है, सबसे पहले कर्तव्य कर्म को ही करना चाहिये, और जब कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो जायें तभी भावात्मक रूप से भगवान की आराधना करनी चाहिये, क्योंकि "शास्त्रों के अनुसार भावनात्मक-कर्म से कर्तव्य-कर्म हमेशा श्रेष्ठ होता है"

जो व्यक्ति हाथ में माला-झोली लेकर चलते रहते है और उसे ही भगवान की भक्ति मान लेते हैं, वह प्रभु की भक्ति नहीं है ऎसे व्यक्ति स्वयं को धोखा ही दे रहें है, यह लोग माला का अर्थ ही नहीं जानते है, जो व्यक्ति माला का वास्तविक अर्थ समझ लेता है वह कभी भी गले में या हाथ में माला-झोली लेकर नहीं चलता है।

माला में जो मोती होते हैं उनको मनका कहा जाता है, मनका का अर्थ होता है मन को स्थिर करने वाला साधन, माला में १०८ मनका होते हैं, माला करते समय हर मनका पर मन की स्थिति का अध्यन करना होता है, जब एक माला पूर्ण हो जाती है तब अध्यन करना होता है कि १०८ बार मन्त्र जपने पर मन कितनी बार भगवान में स्थिर हुआ।

जब निरन्तर माला करते-करते सम्पूर्ण माला पर जिस व्यक्ति का मन पूर्ण स्थिर हो जाता है तब उस व्यक्ति के लिये माला का कोई महत्व नहीं रह जाता है, क्योंकि तब उस व्यक्ति का हर कर्म माला ही बन जाता है।

मन स्थिर केवल एक स्थान पर ही बैठकर हो सकता है, चलते हुए माला करने पर मन कभी स्थिर नहीं हो सकता है, जो व्यक्ति चलते हुए माला करते हैं, उनका मन भगवान में कभी स्थिर नहीं हो सकता है, ऎसे व्यक्ति स्वयं को ही धोखा दे रहे होते हैं।

इसलिये माला एकान्त स्थान में या मन्दिर में ही करनी चाहिये क्योंकि एकान्त में या भगवान की मूर्ति के सामने ही मन स्थिर हो सकता है, चलते-फिरते माला करने वाले समाज की दृष्टि में भले ही भक्त कहलायें और अहंकार से ग्रस्त होकर अपने आप को भले ही भक्त समझने लगे लेकिन भगवान की दृष्टि में तो वह मूढ़ ही होते हैं, ऎसे व्यक्ति कभी भी भगवान की कृपा प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

क्योंकि भक्ति का अर्थ प्रभु से प्रेम करना होता है, प्रेम में स्मरण होता है, स्मरण गोपनीय होता है, इसलिये भक्ति को गोपनीय कहा गया है, भक्ति कोई प्रदर्शन की वस्तु नही होती है, इससे समाज भले ही अनुकूल हो जाये लेकिन भगवान तो प्रतिकूल हो जाते हैं।

कुछ व्यक्ति अपने कर्तव्य-कर्म को छोड़कर अपने गुरु का प्रचार करने में लगे रहते हैं, उसे ही आध्यात्मिक उन्नति समझ लेते है, कुछ व्यक्ति आध्यात्मिक किताबों को पढ़कर और उस किताबी ज्ञान को बाँटकर स्वयं को बहुत बडे ज्ञानी समझकर अपने अहंकार को बढाते रहते हैं।

जो व्यक्ति उनकी प्रशंसा करने वाले होते हैं, उन लोगों को वह अपना मित्र समझते हैं, वास्तव में वह उनके सबसे बड़े दुश्मन होते हैं क्योंकि वह उनकी अहंकार रूप अग्नि को हवा देते रहते हैं और वह उनकी प्रशंसा से स्वयं को ज्ञानी समझने लगते हैं, ऎसे व्यक्ति कभी भी आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर पाते हैं।

ज्ञान बाँटने का अधिकारी केवल वही होता है जिसमें ज्ञान स्वयं प्रकट होता है, या जो गुरु परम्परा से गुरु पद पर आसीन होता है, हर व्यक्ति को स्वयं को पहचानने का प्रयास करना चाहिये कि क्या उसमें वास्तविक ज्ञान स्वयं प्रकट हुआ है कि नहीं, यदि ज्ञान प्रकट नहीं हुआ है तब तक प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक स्तर पर अज्ञानी ही होता है।

उस व्यक्ति को शिष्य अवस्था पर ही स्थित रहना चाहिये, शिष्य का एक ही धर्म हैं सुनकर या पढ़कर जहाँ से भी ज्ञान प्राप्त हो उसे ग्रहण करके आत्मसात करने का प्रयत्न करना चाहिये, ऎसा करने से एक दिन ज्ञान स्वयं प्रकट होने लगेगा तब वह व्यक्ति ज्ञान बाँटने का अधिकारी हो जाता है।

शिष्य स्तर पर स्थित व्यक्ति को कभी भी आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा सार्वजनिक स्थान पर नहीं करनी चाहिये, ऎसे व्यक्ति न तो आध्यात्मिक उन्नति कर पाते हैं और न ही भौतिक उन्नति कर पाते हैं, गुरु बनकर कभी भी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है, जो अच्छा शिष्य होता है वही एक दिन अच्छा गुरु स्वत: ही बन जाता है।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ उन्नति के नियम ॥


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌ ॥
(गीता १६/२३)
भावार्थ : जो मनुष्य कामनाओं के वश में होकर शास्त्रों की विधियों को त्याग कर अपने ही मन से उत्पन्न की गयीं विधियों से कर्म करता रहता है। वह मनुष्य न तो सिद्धि को प्राप्त कर पाता है, न सुख को प्राप्त कर पाता है और न परम-गति को ही प्राप्त हो पाता है।


१. आप उन्नति करना चाहते हैं, तो विश्वास के साथ धैर्य धारण करें।

२. जब तक आपको यह विश्वास न हो, कि सामने वाला व्यक्ति मुझसे अधिक बुद्धिमान है, तब तक उस व्यक्ति से प्रश्न कभी नहीं करना चाहिये। हमेशा स्वयं को मूर्ख, और सामने वाले व्यक्ति को बुद्धिमान समझकर वार्तालाप करें।  

३. जब आप किसी बुद्धिमान व्यक्ति से प्रश्न करें तो कम से कम शब्दों में करें, और प्रश्न करते समय समझाने की भावना नहीं होनी चाहिये, समझाने की भावना से समझने की भावना समाप्त हो जाती है। 

४. जब तक आपको अपने पहले प्रश्न का उत्तर नहीं मिल जाये, तब तक दूसरा प्रश्न कभी नहीं करें, और जो भी उत्तर मिले, उसे सहज भाव से स्वीकार करें।

५. उत्तर को स्वीकार करते समय समझने की इस भावना में रहें कि उत्तर देने वाला सही है, मेरी ही समझ में नहीं आया है, बाद में एकान्त में विचार करें, जब आपका मन उसे स्वीकार करे तभी उस उत्तर को स्वीकार करें। 

६. आप जब तक उत्तर से पूर्ण संतुष्ट न हो जाये, तब तक उसी प्रश्न से संबन्धित प्रश्न ही करें, उत्तर के ऊपर कभी प्रश्न न करें, जब आप उत्तर पर प्रश्न करेंगे तो वार्तालाप बहस का रूप धारण कर लेगी।

७. आपसे जब कोई प्रश्न करे, तो कम से कम शब्दों में उत्तर देने का प्रयत्न करें, और केवल अपना ही दृष्टिकोण ही प्रस्तुत करें, उत्तर देते समय समझाने की भावना का त्याग करें।

८. जब भी किसी भी प्रकार की वार्तालाप बहस में परिवर्तित महसूस हो तो, क्षमा माँगकर वाद-विवाद से बचने का प्रयत्न करें, क्योंकि वाद-विवाद से क्रोध उत्पन्न होने के कारण बुद्धि नष्ट हो जाती है। 

९. आध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा कभी सार्वजनिक स्थान पर नहीं करें, सार्वजनिक स्थान पर आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा, हमेशा बहस के रूप में परिवर्तित हो जाती है, आध्यात्मिक ज्ञान ही सत्य है, सत्य को निर्मल मन से धारण करें। 

१०. आध्यात्मिक वार्तालाप करते समय बुद्धि का उपयोग न करके मन का ही उपयोग करें, बुद्धि का उपयोग भौतिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये करें।

११. जब भी कभी अपने से बड़ी आयु वाले व्यक्ति से वार्तालाप करें, तो उनकी बात को कभी काटने का प्रयत्न नहीं करें। यदि अपने से बड़ों की बात समझ में न आये, फिर भी उनकी बात का विरोध कभी न करें। 

१२. आप से आयु में बड़ा व्यक्ति गलत हो सकता है, फिर भी उनको समझाने की कोशिश न करें, केवल यही सोचें कि उनको समझाने के लिये उनके बड़े हैं, और नहीं तो सबसे बड़े समझाने वाले भगवान तो हैं। 

१३. आप जब भी किसी से वार्तालाप करें, तो पहले यह विचार अवश्य कर लें, कि मैं समझना चाहता हूँ, या समझाना चाहता हूँ, दोनों प्रकार की वार्तालाप एक साथ करने से वाद-विवाद की संभावना अधिक होती है। 

१४. जब आप कुछ समझना चाहते हैं, तो धैर्य धारण करके समझने का प्रयास करें, और शरीर के साथ मन को भी रखने का प्रयास करें, वार्तालाप के समय प्रायः शरीर के साथ मन नहीं होता है।   


१५. जब आप किसी को कुछ समझाना चाहतें हैं, तो केवल अपनी बात ही व्यक्ति के सामने रखें, वह व्यक्ति समझा कि नहीं इस बात का चिंतन न करें, समझना या न समझना, सामने वाले व्यक्ति का कर्म होता है, और स्वयं के लिये वह परिणाम होता है। 

१६. कर्म करना मनुष्य के हाथ में होता है, लेकिन कर्म का परिणाम मनुष्य के हाथ में नही होता है, यह परिणाम की आसक्ति ही मनुष्य के दुख का कारण होती है। 

१७. जब तक उत्तर देने वाला व्यक्ति, उत्तर देकर शान्त न हो जाये, तब तक बीच में न बोलें, बीच में बोलने से उत्तर देने वाले व्यक्ति का ध्यान भंग हो जाता है, जिससे सिर्फ समय बर्बाद ही होता है।

अक्सर, ऎसा देखने में आता है, वास्तव में तो हम समझना चाहतें है, लेकिन हम समझाने लग जाते हैं, इस बात का एहसास ही नहीं हो पाता है, कि हम समझ रहें हैं, या समझा रहें हैं, इस कारण हम समझ नहीं पाते है, और समय तो अपनी चाल से गुजर ही जाता है, गुजरा हुआ समय कभी वापिस नहीं आता है।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ उद्धव गोपी लीला का तात्पर्य ॥


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....

सांख्योगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌ ॥
(गीता ५/४)
अल्प-ज्ञानी मनुष्य ही "सांख्य-योग" और "निष्काम कर्म-योग" को अलग-अलग समझते है न कि पूर्ण विद्वान मनुष्य, क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फल-रूप परम-सिद्धि को प्राप्त होता है।

यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥
(गीता ५/५)
जो सांख्य-योगियों द्वारा प्राप्त किया जाता है, वही निष्काम कर्म-योगियों द्वारा भी प्राप्त किया जाता है, इसलिए जो मनुष्य सांख्य-योग और निष्काम कर्म-योग दोनों को फल की दृष्टि से एक देखता है, वही वास्तविक सत्य को देख पाता है।

निष्काम कर्म-योग:- बिना किसी फल की आसक्ति के कर्तव्य कर्म के द्वारा ज्ञान प्रकट होता है, ज्ञान से वैराग्य उत्पन्न होता है और इन दोनों की प्राप्ति के बाद ही भक्ति की प्राप्ति होती है, भक्ति से ही भगवान की प्राप्ति होती है, इस प्रक्रिया को "निष्काम कर्म-योग" कहते हैं।

सांख्य-योग:- फल की आसक्ति से कर्तव्य कर्म पूर्ण होने के बाद ही वैराग्य को धारण किया जाता है, वैराग्य से ज्ञान प्रकट होता है और इन दोनों की प्राप्ति के बाद ही भक्ति की प्राप्ति होती है, भक्ति से ही भगवान की प्राप्ति होती है, इस प्रक्रिया को "सांख्य-योग" कहते हैं।

कर्म तो दोनों ही अवस्था में हर हाल में करना ही पड़ता है, इन दोनों मार्गों में प्रवेश केवल भगवान की कृपा से ही मिल पाता है, इन दोनों मार्गों से ही मनुष्य़ जीवन की परम-सिद्धि रूप भगवान की प्राप्ति होती है।

भगवान की कृपा केवल उन्ही को प्राप्त हो पाती है जो अपने कर्तव्य कर्मों को अच्छी प्रकार से करते हैं, इसलिये हर व्यक्ति को पहले अपने संसारिक गुरु से कर्तव्य कर्म की ही शिक्षा लेनी चाहिये, क्योंकि कर्तव्य कर्म को किये बिना किसी भी व्यक्ति को इन दोनों मार्गो में प्रवेश नहीं मिल सकता है, इन मार्गों में बिना प्रवेश हुए भगवान की प्राप्ति असंभव है।

कोई भी व्यक्ति बिना कर्तव्य कर्म को किये बिना वैराग्य धारण नहीं कर सकता है, यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य कर्म को जाने बिना कर्म करता है तो वह पाप और पुण्य के चक्कर में पड़कर संसार में जन्म और मृत्यु को निरन्तर प्राप्त होता रहता है।

यदि कोई बिना कर्तव्य कर्म को किये वैराग्य धारण करता है, या अपने को ज्ञानी समझकर कर्तव्य कर्मों का त्याग करता है या अपने कर्तव्य कर्मों को त्याग कर भगवान की भक्ति रूप कर्म करता है तो वह व्यक्ति स्वयं का ही शत्रु होता है।

ऎसा व्यक्ति न तो संसार का ही रह पाता है और न ही भगवान का हो पाता है, वह त्रिशंकु की तरह बीच में ही लटक जाता है, ऎसे जीव को न तो पुरुष शरीर ही प्राप्त होता है और न ही स्त्री शरीर प्राप्त हो पाता है।

पूर्व जन्म में जो ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण ऋषि थे वही गोपीयों के रूप में स्त्री शरीर धारण करके उत्पन्न हुए थे, स्त्री शरीर में गोपीयाँ ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण थीं परन्तु उनमें ज्ञान और वैराग्य प्रकट नहीं था, भगवान श्रीकृष्ण ने गोपीयों को अपने बाल स्वरूप से भक्ति प्रदान की थी, बाल रूप से भक्ति इसलिये प्रदान की थी जिससे गोपीयों में काम वासना न उठ सके, यह काम वासना ही भक्ति में सबसे बड़ी वाधा होती है। इस प्रकार गोपीयों को भक्ति के द्वारा ज्ञान, वैराग्य की प्राप्ति करके तीनों से परिपूर्ण होने पर ही परमहँस अवस्था को प्राप्त हुयीं थीं।

उद्धव पुरुष शरीर में था, जो पुरुष ज्ञान और वैराग्य में पूर्ण स्थित होता है तो उस पुरुष में काम-वासना नहीं होती है, उद्धव में भी ज्ञान और वैराग्य पहले से ही प्रकट थे, भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव को राधारानी के स्वरूप से भक्ति प्रदान की थी, राधारानी के रूप में भक्ति इसलिये प्रदान की थी कि उद्धव ज्ञान और वैराग्य में पूर्ण स्थित था इसलिये वह भक्ति को प्राप्त करने का अधिकारी था। इस प्रकार ज्ञान और वैराग्य के द्वारा भक्ति को प्राप्त करके तीनों से परिपूर्ण होने पर ही परमहँस अवस्था को प्राप्त हुआ था।

इस लीला का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि भगवान यह शिक्षा दी है कि स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं होता है, लेकिन दोनों के धर्म अलग-अलग हैं जो एक दूसरे के पूरक होते हैं, पुरुष को जो शिक्षा स्त्री से मिल सकती है वह पुरुष से नहीं मिल सकती है, और स्त्री को जो शिक्षा पुरुष से मिल सकती है वह स्त्री से नहीं मिल सकती है।

ज्ञान और वैराग्य के द्वारा भक्ति प्राप्त हो या भक्ति के द्वारा ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति हो, जब तक तीनों की प्राप्ति न हो जाये तब तक परमहँस अवस्था प्राप्त होना असंभव है।

कोई भी व्यक्ति तब तक भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता है जब तक वह परमहँस अवस्था को प्राप्त नहीं हो जाता है, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से परिपूर्ण अवस्था ही परमहँस अवस्था कहलाती है, यह परमहँस अवस्था ही गोपी भाव कहलाता है।

मनुष्य को जीवन के परम-लक्ष्य को पाने के लिये क्रमश: तीन गुरुओं की अवश्यता होती है....

१. सांसारिक गुरु,
२. आध्यात्मिक गुरु,
३. सदगुरु।

सांसारिक गुरु से हमें कर्तव्य कर्म की शिक्षा प्राप्त करनी होती है, आध्यात्मिक गुरु से हमें ज्ञान और वैराग्य की शिक्षा ग्रहण करनी होती है, तब जाकर सदगुरु की प्राप्ति होती है जो कि किसी भी शरीर में साक्षात भगवान स्वयं ही होते हैं जो हमें भक्ति की प्रदान करते हैं।

सांसारिक गुरु:- हर व्यक्ति को सांसारिक गुरु जन्म के साथ ही मिलते हैं, आयु और शिक्षा के अनुसार बदलते रहते हैं। यह सभी गुरु हमें सांसारिक कर्तव्य कर्मो की शिक्षा देते हैं।

व्यक्ति का सबसे पहला गुरु उसकी माता दूसरा गुरु पिता और तीसरा गुरु अध्यापक होते हैं, शिक्षा के अनुसार अध्यापक बदलते जाते हैं, फिर शादी के बाद पति और पत्नी एक दूसरे के गुरु ही होते हैं, जब हम किसी व्यक्ति से कहीं जाने का रास्ता पूछते हैं तो वह व्यक्ति भी कुछ समय के लिये हमारा गुरु ही होता है, इस प्रकार सांसारिक गुरु हमें हर कदम मिलते हैं।

आध्यात्मिक गुरु:- जब व्यक्ति अपने कर्तव्य कर्मों को करते हुये अपने आध्यात्मिक उत्थान की कामना करता है तब आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता होती हैं, आध्यात्मिक गुरु का संग करने पर ही सत्संग आरम्भ होता है, जिनके द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा शब्द रूप में ही मिलती है, जब व्यक्ति गुरु की आज्ञा के अनुसार कर्म करने लगता है तो व्यक्ति का अज्ञान मिटने लगता है, अज्ञान मिटने के साथ ही वैराग्य उत्पन्न होना शुरु होता है तभी व्यक्ति को गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा और सम्पूर्ण विश्वास स्थिर हो पाता है।

सदगुरु:- जब व्यक्ति की पूर्ण श्रद्धा और सम्पूर्ण विश्वास आध्यात्मिक गुरु में स्थिर हो जाता है तो गुरु रूप उस शरीर से उस व्यक्ति के लिये सदगुरु के रूप में भगवान स्वयं प्रकट होकर अपना परिचय स्वयं कराते हैं, और अनुभव कराकर विश्वास दिलाते हैं, जब व्यक्ति को सम्पूर्ण विश्वास हो जाता है तो उस व्यक्ति के शरीर रूप रथ के सारथी भगवान स्वयं हो जाते हैं, तब जीव कर्तापन के भाव से मुक्त हो जाता है, इस अवस्था पर ही अहंकार समाप्त हो पाता है, यहाँ से वह शरीर में स्थित जीव वर्तमान कर्म-फलों से मुक्त हो जाता है।

वह जीव शरीर में रहकर भी सभी वर्तमान कर्म-फलों से मुक्त रहता है, वह जीव वर्तमान शरीर में पूर्व जन्मों के कर्म-फलों को भोगकर शरीर त्याग के साथ भगवान के नित्य परम-धाम में प्रवेश पा जाता है, जहाँ पहुंचकर कोई भी जीव वापिस इस संसार में नहीं आता है। यही मनुष्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य है।

उद्धव और गोपीयों मे कोई भेद नहीं है, जो लोग उद्धव को निम्न समझते हैं, और गोपीयों को श्रेष्ठ समझते हैं उनसे बड़ा मूर्ख और अपराध करने वाला संसार में अन्य कोई और नहीं हो सकता है।

जिसे संसार में भक्ति के नाम से जाना जाता है, वह तो जो भी संसार में अन्य कर्म होते हैं उनके समान ही कर्म होता है, वास्तविक भक्ति तो प्राप्त होती है।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ माया एक मात्र धोखा है ॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....

न मां दुष्कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमिश्रिताः॥ 
(गीताः ७/१५)
मनुष्यों में अधर्मी और दुष्ट स्वभाव वाले मूर्ख लोग मेरी शरण ग्रहण नहीं करते है, ऐसे नास्तिक-स्वभाव धारण करने वालों का ज्ञान मेरी माया द्वारा हर लिया जाता है।

भगवान की माया बहुत प्रबल है, मनुष्य को जल्दी से पता चलने नहीं देती कि वह क्या चाहता है, हम जिन चीजों की इच्छा कर रहे हैं वे चीजें जिनके पास हैं क्या वह तृप्त हो गये हैं? हम जो कुछ चाहते हैं क्या वह जीवन का सही लक्ष्य है? हम जो कुछ बनाये जा रहे हैं, सजाये जा रहे, क्या वह साथ जायेगा? माया में हमारी बुद्धि उलझी हुई रह जाती है।

अज्ञान से हमारा ज्ञान ढक गया है, हम मोहित हो गये हैं, जीव ब्रह्म-पद से जन्तुओं की श्रेणी में आ गया हैं, यदि जीव माया के तीन गुणों से बचने की विधि जान ले, मोहनिशा से जाग जाये भगवान की शरण ग्रहण प्राप्त कर ले, ऎसी समझ पा ले तो पता चलेगा कि अनेक जन्मों से हमने अपने ही साथ धोखा किया है।

हम अपने साथ कभी बुरा करना नहीं चाहते लेकिन हम वही स्वभाव को अपनाते रहे हैं जिससे हमारा अहित ही होता आया है, हम वे ही पदार्थ चाहते हैं जिन पदार्थों के कारण हमारा ज्ञान ढ़का रहता है, हम वही सुविधाएँ चाहते हैं जिससे हमारा मन दुर्बल बना रहता है, और जिससे मनोबल नष्ट हो जाता है।

हम केवल वही पद चाहते हैं जिससे हमारा मिथ्या अहंकार बढ़ता रहता है, हम वही सुख चाहते हैं जिससे हमारी वासनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती हैं, इस कारण हमारी वासनाएँ कभी निवृत्त नहीं हो पातीं, अगर वासना निवृत्त होने वाले सुख में गोता खायें तो बेड़ा पार हो जायेगा, वह केवल भगवान का नाम ही है।

वासनाओं को भड़काने वाला सुख कामनाओं की पूर्ति करने वाला सुख है, विषयों का सुख है, कामनाओं का सुख लेते हुए हम अनेको जन्मों से भटकते आये हैं, अनेकों जन्मों से जीते आये हैं, हमारा यह मनुष्य जन्म है, शायद इस बात को समझ पाएँ, इस वचन को हम समझ जाएँ कि यह सब माया है।

माया का अर्थ होता है धोखा, माया का अर्थ होता है जो नहीं है फिर भी दिखलाई देता है, माया का अर्थ होता है जिसका वास्तविक अस्तित्व नहीं है, वास्तविक सार नहीं है, वास्तविक सत्ता नहीं है फिर भी सब कुछ प्रतीत होता है, जो वास्तव में है ही नहीं उससे लड़ना तो मूर्खता ही होगी।

मिट्टी का कोई पुतला जमीन से लड़ने जाय, कोई घट चट्टान से लड़ने जाय तो क्या होगा? फूट ही जाएगा, ऐसे ही हमारा यह स्थूल शरीर है, हमारा मन है, हमारी बुद्धि है, हमारा कारण शरीर है, यह सब माया के द्वारा निर्मित हुए हैं, विशाल ब्रह्माण्डों में विखरी हुई इसी माया की सत्ता से निर्मित हुए इन साधनों से ही माया को जीतने की इच्छा करेंगे तो जीतना असंभव है, जिसप्रकार बुलबुला सागर को वश करना चाहे तो सागर का बुलबुले के वश होना असंभव है।

बुलबुला सागर को वश में न करने का प्रयत्न छोड़कर, बुलबुला अपनी वास्तविक स्थिति को जान ले तो पता चलेगा कि मैं पानी ही हूँ, सागर भी तो पानी ही पानी है, जिसप्रकार बुलबुला पानी की शरण ग्रहण कर लेता है तो बुलबुला भी सागर हो जाता है, उसीप्रकार जीव अपना वास्तविक रूप जानकर भगवान की शरण ग्रहण कर लेता है तो उस जीव के लिए माया से पार पाना आसान हो जाता है।

कोई भी मनुष्य माया में रहते हुए, मन में रहते हुए, बुद्धि में रहते हुए, शरीर में रहते हुए, अहंकार में रहते हुए, कोई भी मनुष्य अपनी अक्ल से, अपने बाहुबल से, अपने धन से, अपने वैभव से, अपने मित्रों के सहारे, अपनी सत्ता की कुर्सी के द्वारा अगर माया को पार करना चाहता है तो वह उसीप्रकार नादान है, मानो वह सागर पर गद्दे बिछाकर सागर को पार करना चाहता है।

यह माया तीन गुणों से युक्त होती है उसके किसी न किसी गुण से हम अपना अहंकार जोड़ देते हैं, जैसे नींद आती है शरीर की थकान के कारण, यानि तम गुण के कारण और हम कहते हैं कि मुझे नींद आ रही है, भूख लगती है शरीर को लेकिन हमारा अहंकार कहता है कि मुझे भूख लग रही है, खुशी होती है मन को लेकिन हम सोचते हैं मुझे खुशी प्राप्त हो रही है, शोक होता है मन को और हम सोचते हैं कि मैं दुःखी हूँ।

माया के गुणों के साथ हम एक रूप स्वत: ही हो जाते हैं क्योंकि हमने भगवान की शरण ग्रहण नहीं की हैं, इसलिये हम माया के गुणों की शरण हो स्वत: ही हो जाते हैं, हम भगवान के शरणागत नहीं हुए हैं इसलिए मान-अपमान की शरण स्वत: ही हो जाते हैं, हमने भगवान की शरण नहीं ली हैं इसलिए अपनी कल्पना शक्ति के शरण स्वत: ही हो जाते हैं और खुद ही खो जाते हैं गुणों के अधीन होकर, अपनी अक्ल है नहीं और दूसरों का मानना भी नहीं है, इसी का नाम माया है।

माया गुणमयी है इस माया से किसी का भी मनुष्य का स्वयं बच पाना असंभव है, धन-सम्पदा का अहंकार, सत्ता या पद का अहंकार, धर्मात्मा होने का अहंकार, पुण्यात्मा होने का अहंकार, भगवान का सेवक होने का अहंकार, योग साधक होने का अहंकार, भक्त होने का अहंकार, कुछ न कुछ होने का अहंकार हमारे चित्त में पैदा कर ही देती है।

माया तब तक हमें अपनी लपेटे में लेती रहती है, तब तक हमें इस भवकूप गिराती रहती है, जब तक हम परमात्मा के पूर्ण शरणागत नहीं जाते हैं, जब तक हम में सभी प्रकार की भूख मिटकर परम-तत्व भगवान की ही भूख नहीं रह जाती है तब तक माया हमसे मजदूरी कराती ही रहती है।

हम धन कमायेंगे तभी सुखी हो पायेंगे, हमें पद-प्रतिष्ठा मिलेगी तो सुखी हों पायेंगे, शत्रु मर जायेगा तभी सुखी हो पायेंगे, मित्र आ जायेगा तो सुखी हो जायेंगे, ये सब मन की कल्पना मात्र हैं और मन तो माया से ही बना हुआ है।

शरीर तो बना है माया की मिट्टी से, अभिमान होता है कि मैं यह हूँ, मन बना है माया के सूक्ष्म तत्त्वों से, हमें अभिमान होता है कि मैंने अच्छा काम किया, मैंने बुरा काम किया, मैंने पाप किया, मैंने पुण्य किया, अरे! तू करने वाला है कौन? उस अनन्त की हवाएँ लेकर तू अपने फेफडों को चला रहा है, उस भगवान के तेज अंश की सत्ता से सूर्य की किरणें तुम्हे जीवित रख रही हैं, तेरा अपना क्या है?

वास्तव में तो भगवान की ऐसी अदभुत करुणा है, कृपा है कि देने वाला हमें दिखाई नहीं देता है और जो कुछ मिलता है उसे हम अपना समझ लेते हैं, शरीर भगवान ने दिया है, सभी वैज्ञानिक मिलकर भी एक राई का एक दाना बना नहीं सकते है, मिट्टी का एक नया कण भी नही बना सकते है, जो कुछ बनाएँगे वह अनन्त भगवान की बनायी हुई चीजों को ही जोड़कर ही बना पायेंगे और फिर उसमें मैं और मेरा करके मालिक बन जाएँगे फिर कहेंगे यह मेरा है।

यदि घर तुम्हारा है तो क्या घर में लगी की ईंटें तुमने बनायी हैं?
नहीं, कुम्हार ने बनायी है।

कुम्हार ने कैसे बनायी है?
मिट्टी, पानी और आग से बनाई है।

मिट्टी कुम्हार ने बनायी?
नहीं।

आग कुम्हार ने बनायी?
नहीं।

पानी कुम्हार ने बनाया?
नहीं।

पानी कुम्हार का नहीं, आग कुम्हार की नहीं, मिट्टी कुम्हार की नहीं तो ईंटें कुम्हार की कैसे हो सकती हैं? ईंटें कुम्हार की नहीं हैं तो यह ईंटें तुम्हारी भी नहीं हैं, जब ईंटें तुम्हारी नहीं हैं तो घर तुम्हारा कैसे हो सकता है।

लेकिन माया में उलझकर बोलते हैं कि यह मेरा घर है, व्यवहार के लिए मान लो, कह लो यह मेरा घर है यह तेरा घर है, लेकिन अन्दर से तो यही विचार करो कि यह किसका घर? क्या मैं, क्या मेरा?

यदि निरन्तर इतना ही विचार कर लिया तो सभी विकार स्वयं ही जलकर भस्म हो जायेंगे और यही जीवन आपका अन्तिम जीवन बन जायेगा, यही मानव जीवन का एक मात्र लक्ष्य है।

॥ हरि ॐ तत सत ॥

॥ ऊखल लीला का तात्पर्य ॥


भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
(गीता: 4/9)
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) होते हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से जन्म को प्राप्त नही होता है, बल्कि मुझे अर्थात मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है।

जब तक मनुष्य प्रेम-भक्ति से भगवान अपना बनाने में लगा रहता है तब तक भगवान मनुष्य के बन्धन में नहीं बँधते हैं, जब मनुष्य भगवान को मन सहित बुद्धि को पूर्ण समर्पित कर देता है तब भगवान उस भक्त के बन्धन में हो जाते हैं। ऊखल लीला के माध्यम से भगवान ने हम सभी को यह शिक्षा दी है।

भगवान जिस भक्ति रूपी डोरी से, ऊखल रूपी मनुष्य से बँधते हैं, जब तक मनुष्य में अहंमता और ममता रूपी दो ऊँगल रहते हैं, तब तक भक्ति रूपी डोरी दो ऊँगल छोटी ही बनी रहती है।

डोरी=प्रेम=भक्ति!

ऊखल=(ऊ+खल)=(उल्टा+दुष्ट)=मनुष्य!

एक ऊँगल=(मैं)=(अहमता)=(मिथ्या अहंकार)=(कर्तापन का भाव)=शरीर को कर्ता मानना!

दूसरा ऊँगल=(मेरा)=(ममता)=(मोह)=जो अपना नहीं है उसे अपना समझना!

भगवान से प्रेम इन छ: भावों के द्वारा किया जा सकता है।

१. मैया यशोदा की तरह (वात्सल्य भाव से)

२. अर्जुन की तरह (सख्य भाव से)

३. गोपीयों की तरह (माधुर्य भाव से)

४. अक्रुर की तरह (दास्य भाव से)

५. उद्धव की तरह (ज्ञान भाव से)

६. सुदामा की तरह (शान्त भाव से)

जब कोई मनुष्य इन छ: भावों में से किसी भी एक भाव में पूर्ण श्रद्धा और सम्पूर्ण विश्वास से शरणागत भाव में स्थित होकर भगवान की भक्ति करता है तो एक दिन भगवान की कृपा का पात्र बन जाता है।

जब कोई मनुष्य भगवान की कृपा का पात्र बन जाता है तो उस मनुष्य के हृदय में भगवान का ब्रह्म स्वरूप में ज्ञान का प्राकट्य होने लगता है।

जब तक माता यशोदा ममता के वश में होकर कान्हा को अपना पुत्र समझकर अहमता के वश में होकर कहतीं हैं कि आज मैं तोहे डोरी से बाँधुंगी, तब तक वह डोरी दो ऊँगल छोटी ही रहती है।

जब माता यशोदा कहतीं है कि लाला मैं तो हार गयी, यहाँ माता यशोदा का पूर्ण समर्पण होता है, तब भगवान की कृपा से दोनों अहमता और ममता मिट जाने से प्रेम रूपी डोरी पूर्ण हो जाती है, उस डोरी में भगवान स्वयं बँधकर ऊखल से बँध जाते हैं।

तब भगवान ऊखल रूपी जीव के द्वारा अहमता और ममता रूपी नलकूबर और मणिग्रीव स्वरूप वृक्षों को जड़ से ही उखाड़ देते हैं।

इस लीला के माध्यम से भगवान ने यह शिक्षा दी है कि भगवान अतिरिक्त हर वस्तु ज़ड़ स्वरूप ही है।

॥ हरि ॐ तत् सत् ॥